Saturday, 2 December 2017

लघुकथा--जात-पात।





राधिका और रोहन आज अपनी शादी की पाँचवी सालगिरह मना रहे थे। शादी के पाँच साल बाद भी वे दोनो एक दूसरे को उतनी ही मोहब्बत करते थे। लेकिन एक बात आज तक दोनो ने एक दूसरे से साझा नहीं किया था। और वो बात थी उन दोनो के शादी से पहले के प्रेम की।
रोहन ने बड़ी हिम्मत जुटाकर दबी सी आवाज में राधिका से कहा, "राधिका, आज मैं तुम्हे कुछ कहना चाहता हूँ। चेहरे का अलग भाव देखकर राधिका ने जवाब दिया, "हाँ रोहन बोलो ना क्या बात है।" 
"राधिका, शादी से पहले मैं किसी और से प्यार करता था लेकिन वो मेरे जात की नहीं थी। इसलिए घरवालों ने हमारी शादी नहीं होने दी।" रोहन की बात सुनकर राधिका आश्चर्यचकित थी, क्योंकि वो भी यही बात कहना चाहती थी। जी हाँ, राधिका को भी किसी और से प्यार था लेकिन वो लड़का दूसरे जात का था।
"एक ही जात ने हम दोनो को तो मिलवा दिया लेकिन क्या वाकई हमारे दिल आपस में मिल पाये हैं।"
आज शादी की पाँचवीं वर्षगांठ पर राधिका और रोहन शायद यही सोच रहे थे।

©नीतिश तिवारी


Friday, 1 December 2017

और निखरा हूँ मैं।





तुम्हारे शहर से कई बार गुजरा हूँ मैं,
पर कभी भी वहाँ नहीं ठहरा हूँ मैं,
मोहब्बत की मजबूरियाँ मुझे मत सुनाया करो,
तेरे इश्क़ में बेवफाई से और निखरा हूँ मैं।

©नीतिश तिवारी।

Sunday, 19 November 2017

तुम्हे प्यार किया।




इस इश्क़ की ना जाने कैसी तलब,
जो हमने अपना दिल हार दिया।
ये जानता था कि तुम बेवफा हो,
फिर भी हमने सिर्फ तुम्हे प्यार किया।

©नीतिश तिवारी।

Monday, 13 November 2017

मज़हब--लघुकथा।

"घर में भले ही हम दोनो पति पत्नी हों लेकिन यहाँ पर मैं एक अधिकारी और तुम एक इंस्पेक्टर हो", सबीना ने गुस्से भरे स्वर में अपने पति श्याम से कहा।
अलग धर्म के होने के बावजूद दोनो प्यार से रहते थे लेकिन पिछले कुछ दिनों से उनके रिश्ते में कड़वाहट भर आई थी। कारण था उन दोनो का काम। 
सबीना ने अपने पति को फिर से कहा," अगर मेरे 22 मदरसों के खिलाफ तुमने कोई भी कार्यवाही की तो फिर मैं भी तुम्हारे 18 गौशलाओं के खिलाफ जांच बैठा दूंगी।" इंस्पेक्टर पति को अपने पत्नी से ऐसे सवाल की उम्मीद नहीं थी लेकिन सबीना भी तो IAS अधिकारी थी। वो लगातार बोलती रही। फिर उसने सवाल किया, " आजकल सभी सरकारी बिल्डिंग और बसों के रंग बदलकर भगवा किये जा रहे हैं। तुम उस पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं करते?" अब श्याम को बोलने का मौका मिल गया था। उसने तुरंत बोला, " पहले भी तो सभी बसों का रंग हरा किया गया था और सारे योजनाओं के नाम के आगे समाजवादी लिखा हुआ था।" सबीना और श्याम की कभी ना खत्म होने वाली बहस जारी थी। और पास में बैठे दो हवलदार उनकी बाते सुनकर मुस्कुरा रहे थे।

©नीतिश तिवारी।

Sunday, 5 November 2017

इश्क़ मुकम्मल।















इश्क़ मुकम्मल हो या ना हो,
मैं एक बार इसे करूँगा जरूर।

विजय हो जाऊँ या पराजय मिले,
मैं एक बार युद्ध लडूंगा जरूर।

किसी को बुरा लगे या भला,
मैं एक बार सँच कहूँगा जरूर।

दुनिया को भरोसा नहीं आज मुझपे,
मैं एक बार मुकाम बनाऊंगा जरूर।

©नीतिश तिवारी।

Tuesday, 31 October 2017

बदनाम इश्क़।




ये इश्क़ बड़ा बदनाम करता है,
ये बूढ़ों को भी जवान करता है।
जो भी इश्क़ में पड़ता है अक्सर,
वो सुबह को भी शाम कहता है।
©नीतिश तिवारी।

Tuesday, 17 October 2017

मोहब्बत भी मेहमान।











हसरतें दिल की सारी नाकाम हो जाती हैं,
आप ना आए तो सुबह से शाम हो जाती है।

छुप कर मोहब्बत करने की लाख कोशिश करें,
फिर भी ये मशहूर सरेआम हो जाती है।

कितनी शिद्दत से रौशन करता हूँ अपने घर को,
बाती दिया की आंधियों के गुलाम हो जाती है।

वक़्त रहते तुम जी भर के मोहब्बत कर लो,
एक उम्र के बाद मोहब्बत भी मेहमान हो जाती है।

©नीतिश तिवारी।

Thursday, 5 October 2017

आजकल मैं इश्क़ कर रहा हूँ।














आजकल मैं इश्क़ कर रहा हूँ,
आजकल मैं बेरोजगार हूँ।
बहुत लोग मेरे पीछे पड़े हैं,
आजकल मैं कर्ज़दार हूँ।

©नीतिश तिवारी।

Sunday, 10 September 2017

बेबसी - लघुकथा।














रमेश वैसे तो काम करने में मेहनती आदमी था। लेकिन कुछ समय से बॉस उसके काम में रोज़ गलतियाँ निकाल रहा था। आखिरकार वो दिन भी आ गया जब रमेश को उसके बॉस ने नौकरी से निकाल दिया।

थका हारा रमेश शाम को अपने घर पहुंचता है।
रमेश ने पत्नी से कहा, "एक ग्लास पानी देना"।
पत्नी ने जवाब दिया, "खुद ही ले लीजिये फ्रिज में रखा है"।
हालाँकि रमेश का मूड ठीक नहीं था फिर भी उसने प्यार से पत्नी से पूछा,"ऐसे जवाब क्यों दे रही हो?"
पत्नी ने जवाब दिया, "अभी मम्मी का फोन आया था, वो पूछ रही थीं कि दामाद जी ने शादी के समय तुम्हे नेकलेस दिलाने का वादा किया था उसका क्या हुआ। मैं मम्मी को जवाब नहीं दे पायी।
शादी को एक साल हो गया और अभी तक  आपने नेकलेस नहीं दिलवाया।"
पत्नी की बातों को सुनकर रमेश स्तब्ध था।
पत्नी की नज़रें जवाब के इंतज़ार में उसके चेहरे पर टिक गयी थी।


©नीतिश तिवारी।

Thursday, 7 September 2017

अखबार बन जाऊँगा।














तेरी डूबती कश्ती का पतवार बन जाऊँगा,
तेरी मोहब्बत का कर्जदार भी बन जाऊँगा,
आज जी भर के मुझे प्यार कर लो,
नहीं तो कल सुबह का अख़बार बन जाऊँगा।

©नीतिश तिवारी।

Monday, 4 September 2017

नकाब में आये हैं।














ज़ख्मों को सीने का तरीका सीख रहा हूँ,
अपनों से मिलने का सलीका सीख रहा हूँ।
मोहब्बत और दर्द को तो साथ रहने की फितरत है,
इन्हें जो अलग कर दे वो मसीह ढूंढ रहा हूँ।

आज मेरी आँखों में रौशनी आयी है,
आज वो मिलने नक़ाब में आये हैं,
फुर्सत से बात करने का इरादा था मेरा,
आज वो पीकर शराब बेहिसाब आये हैं।

©नीतिश तिवारी।



Tuesday, 22 August 2017

गाँव से शहर।












मेरी आवारगी खत्म हुई थी,
दीवानगी की शुरुआत थी,
मोहब्बत होने ही वाली थी,
और वो बेवफ़ा हो गए।

हम आशिक़ होके भी मशहूर ना हो सके,
तुमने बेवफ़ा बनकर खूब नाम कमा लिया।

आजकल तेरे खयालों के रंगीन सपने आते हैं,
लगता है मैं भी अब गाँव से शहर हो गया हूँ।

©नीतिश तिवारी।

Tuesday, 30 May 2017

शायरी आपके लिए।






तुझको चाहा तो मैंने मगर पा ना सका,
तेरी आँखों की दरिया में डुबकी लगा ना सका,
तुम्हे मेरी ज़िन्दगी के उजाले से नफरत थी,
चारों तरफ अंधेरा था, मैं तेरे पास आ ना सका।

तेरे चेहरे की रंगत को मैं पा भी ना पाया,
और इस दर्द की दवा को मैं ला भी ना पाया।

तुझे फुर्सत मिले तो कभी याद कर लेना,
ज़िंदा हो चुका हूँ, फिर से बर्बाद कर लेना।

©नीतिश तिवारी।

Wednesday, 17 May 2017

चाँदनी के लिए।




मुझे कभी ऊंचाइयों से गिराने की कोशिश मत करना,
मैं एक सितारा हूँ, हमेशा चमकता रहूँगा।
और अगर कभी आसमान में नज़र नहीं आया तो,
समझ लेना, अमावश का चाँद बन गया हूँ, चाँदनी के लिए।

©नीतिश तिवारी


Thursday, 20 April 2017

मेहंदी--मोहब्बत वाली।















तेरे हाथों में मेहंदी,
जो मेरे नाम की थी,
तेरे हाथों से वो,
शायद मिट गयी होगी।
लेकिन मेरे साँसों में,
उस मेहंदी की महक,
ज़िन्दा है आज भी।

वो लाल रंग सिर्फ,
मेहंदी का रंग नहीं था।
मेरी बेरंग जिंदगी का,
एक प्यारा सा उमंग था।

तेरी खूबसूरत हाथों में रची,
उस महकती मेहंदी को,
आज भी देखता रहता हूँ।
बस इसी इंतज़ार में,
एक दिन फिर से,
तुम रचाओगी वो मेहंदी,
अपने साजन के लिए।

©नीतिश तिवारी।